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माता-पिता को शुख पहुंचाने वाले पुत्र संसार में दुर्लभ संत राम बालक दास

25 अक्टूबर प्रतिदिन की भांति आज भी ऑनलाइन सत्संग का संत श्री राम बालक दास जी के द्वारा उनके विभिन्न व्हाट्सएप ग्रुपों में प्रातः 10:00 बजे आयोजित किया गया जिसमें सभी भक्तों को अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त हुआ
आज डुबोबती यादव जी ने अपनी जिज्ञासा प्रस्तुत करते हुए बाबा जी से पूछा कि सुनू जननी सोई सुत बड़भागी।जो पितु मातु बचन अनुरागी।।

तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुरलभ जननि सकल संसारा ।।इस प्रसंग पर प्रकाश डालने की कृपा हो भगवन, बाबा जी ने इन पंक्तियों के भाव को समझाते हुए बताया कि रामचरितमानस में जब श्री राम जी वन गमन को प्रस्थान करते हैं तब माता कौशल्या राम जी से कहती है धन्य है वह पुत्र जो माता पिता की आज्ञा को अपने जीवन का मंत्र बना ले माता-पिता को सुख देने वाले ऐसे आज्ञा का पालन करने वाले पुत्र संसार में दुर्लभ है ऐसे ही पुत्र हम सभी को बनना चाहिए

प्रेमचंद साहू जी ने जिज्ञासा रखते हुए बाबा जी से प्रश्न किया कि श्री कृष्ण अपने पैर को मोड कर क्यों खड़े होते हैं उनका क्या महत्व है बताने की कृपा हो गुरुदेव, बाबा जी ने बताया कि श्रीकृष्ण की अभंग कटाक्ष मुद्रा सभी को मनमोहित कर लेती है, जो मुरली मनोहर की यह झांकी अपने हृदय में बसा लेते हैं उनकी सारी पीड़ाए दूर हो जाती है, भगवान की यहा मुद्रा प्रकृति का परिचायक है प्रकृति पुरुष श्री कृष्ण भगवान कि हम मुद्रा प्रकृति का ज्ञान कराती है
रामफल जी ने जिज्ञासा रखी की एकहि धर्म एक व्रत नेमा। कांय बचन मन पति पद प्रेमा।। इस पर प्रकाश डालने की कृपा हो गुरुदेव, बाबा जी ने बताया कि पत व्रत धर्म के लिए, महा सती माता अनुसूया ने माता सीता को उपदेश दिया कि हे सीते आपका नाम लेते हुए सभी नारी भवसागर से पार उतर जाती है

उनका पतिव्रत धर्म पूर्ण हो जाता है, जो नारी मन क्रम वचन से अपने पति पर विश्वास रखती है उनका कल्याण हो जाता हैं और यह केवल स्त्रियों के लिए नहीं जगत में हर पुरुष हर स्त्री को भी अपने जगतपति परमात्मा के लिए भी मन कर्म वचन से समर्पित और पूर्ण विश्वास के साथ जीवन जीना चाहिए गिरधर सोनवानी जी ने पूछा यज्ञ कितने प्रकार के होते है क्या अग्नि को साक्षी मानकर हवन किया जाता है वही यज्ञ है या कुछ और कृपया मार्गदर्शन करने की कृपा हो, इस जिज्ञासा पर प्रकाश डालते हुए बाबा जी ने बताया की भागवत गीता में इस विधान को वर्णित किया गया है यज्ञ तीन प्रकार के होते हैं,

आत्म यज्ञ जो अपने प्राणों में प्राण को हवन करते है प्रति श्वास को परमात्मा को समर्पित करते हुए अच्छे कर्म करता है, दूसरा होता है देव यज्ञ जो हम देवताओं को समर्पित करके हवन करते हैं, जिसमें हम यज्ञ कुंड बनाते हैं अग्नि जलाते हैं स्वाहा करते हैं वह होता है, तीसरा होता है भूत यज्ञ जिसमें हम वृक्ष को जल देना चिड़िया को पानी देना नेक कार्य करते हैं और इसी का एक रूप है अपने पूर्वजों के लिए यज्ञ करना इस प्रकार से यज्ञ के तीन रूप है

अद्भुत पंक्तियों “दैहिक दैविक भौतिक तापा।राम राज नहिं काहुहि ब्यापा।।सब नर करहि परस्पर प्रीती।चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती।।।” पर प्रकाश डालते हुए बाबा जी ने बताया कि इन चौपाइयों से हमें ज्ञान प्राप्त होता है कि जहां सभी अपने स्वधर्म का पालन करें, और अपने अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं नाना प्रकार के अहंकार घमंड को छोड़ते हुए सहनशक्ति धीरज और धर्म को अपनाते हुए एक दूसरे का सम्मान करते सुख दुख की परवाह करते हुए जीवन जिए तो वहां अपने आप दैविक दैहिक और भौतिक तीनों ताप रहेंगे ही नहीं
इस प्रकार आज का ऑनलाइन सत्संग बाबा जी की मधुर भजनों के साथ संपन्न हुआ
जय गौ माता जय गोपाल जय सियाराम

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