छत्तीसगढ़
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Chhattisgarh: साधु संतों का रूप देखकर नही बल्कि उनकी तपस्या ओर गुण देखकर सम्मान करें सन्त राम बालक दास

Chhattisgarh: नारद साहू: प्रतिदिन की भांति संत श्री राम बालक दास जी का ऑनलाइन सत्संग प्रातः 10:00 से 11:00 1 घंटे के लिए उनके भक्त गणों की जिज्ञासाओं का समाधान देते हुए आज भी आयोजित किया गया आज की परिचर्चा में जिज्ञासा प्रकट करते हुए, विजय शर्मा जी ने जिज्ञासा रखी की

श्रीरामचंद्र जी के जीवन में साधू-संतो और ऋषि-मुनियों के लिए कैसा भाव-आदर होता था?वर्तमान कलिकाल में समाज को समकालीन संतों के लिए कैसा व्यवहार और आदर रखें?क्यों अभी साधू-संतों को जाति-पाति के बंधन में बांध दिया गया है?कृपया उचित मार्गदर्शन करें, बाबा जी ने बताया कि,

उस समय के ऋषि मुनि सिद्ध अद्भुत ज्ञान और विद्वान थे भगवान श्री राम जी का उनके प्रति पूर्ण समर्पण भाव था उनके बाल्यकाल से लेकर उनके राजतिलक के बाद तक भी हमें ऐसे कई प्रसंग मिलते हैं जहां पर वे जंगल में जाकर ऋषि-मुनियों के पास जाकर बैठ जाया करते थे एवं ज्ञान अर्जन करते थे पुरानी कथाओं को सुनते एवं उनका सार ले कर उसे अपने जीवन में चरितार्थ करते थे,

भगवान राम स्वयं भगवान थे फिर भी उन्होंने ऋषि-मुनियों का पूर्ण सम्मान किया आप सब को भी अपने जीवन में संत महात्माओं को सम्मान देना चाहिए, लेकिन वह संत कैसा हो इसे जान लेना आज के युग के परिपेक्ष में आवश्यक हो जाता है क्योंकि कलयुग में संत नाम पर ठगी बहुत हो रही है,,

कुछ बहरूपियों के कारण पूरा संत समुदाय आज बदनाम हो रहा है इसीलिए तुलसीदास जी ने कहा भी है कि किसी के भी रूप को देखकर नहीं उसके गुणों को देखकर उसे पहचाना जाना चाहिए, हमारे घर की माता बहनों को अंधविश्वास से ऊपर उठकर इन सब के विषय में सोचना चाहिए एस आर यादव जी ने जिज्ञासा रखी की,गुरु देव मन में अशांति सी रहती हैं संसार निरस सा लगने लगता हैं,

ऐसा क्यों.. क्या करू कुछ उपाय बताईये भगवन, बाबा जी ने बताया कि जिस व्यक्ति को अपने मन की अशांति के विषय में भास हो जाता है, तो उस व्यक्ति का मन संसार में कभी नहीं लगता, क्योंकि वह संसार को केवल नीरस मानता है एवं भगवान को संपूर्ण सुख का स्थान मानता है ,

मन की अशांति का एकमात्र इलाज यही है कि आप भगवान के नाम का सुमिरन कीजिए भगवान का भजन कीजिए सकीर्तन कीजिए सत्संग कीजिए और गुरु की शरण में अपने आप को समर्पित कर दीजिए, भगवान के सुंदर रूप का दर्शन कीजिए उनका गुणगान कीजिए आप स्वयं पाएंगे कि मन को अद्भुत शांति प्राप्त हो रही है, और संसार का नीरस लगना ही आपको भगवान में प्रीति उत्पन्न कराता है

मेघनाथ श्रीवास जी ने जिज्ञासा रखी की, तिलक लगाने की क्या विधि है, बाबा जी ने बताया कि तिलक स्नान के बाद भगवान को अर्पित करके अनामिका उंगली से स्वयं को लगाया जाता है, हमारे हिंदू धर्म में तिलक की बहुत अधिक महिमा है जिस तरह से औरतों के लिए प्रतीक रूप पर सिंदूर का तिलक है तो पुरुष वर्ग के लिए भी यह प्रधान स्वरूप है इसके बिना आपका कोई भी धर्म कार्य का औचित्य नहीं है हिंदू धर्म में तिलक का इतना महत्व है कि तिलक लगाए बिना घर से बाहर नहीं निकला जाता, हिंदू सनातन कर्म या धर्म में तिलक का प्राधान्य है इस प्रकार आज का ऑनलाइन सत्संग संपन्न हुआ

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